Sunday, January 13, 2019

लौट आ कि बड़ा बेकरार सा हूँ




लौट कि बड़ा बेकरार सा हूँ,
किसी चक्की में पिसा लाचार सा हूँ

होठों  की हंसी थी  कसी कसी
आज ढीली पड़  गई पीली,
कोई कांच का टूटा  जार सा हूँ,
लौट कि बड़ा........ 

हर धड़कन सूनी ज्यों धधके धूनी,
बस तेरी रट सी है उलझी कोई लट सी है,
जो नहीं निकला वो सार सा हूँ,
लौट कि बड़ा........

तेरी याद घनी पर्वत सी तनी,
सब छोड़ गिले गर गले मिले,
फिर फंदा भी कोई हार सा है,
लौट कि बड़ा बेकरार सा हूँ,
किसी चक्की में पिसा लाचार सा हूँ।Gyan Potli

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