Sunday, January 13, 2019

मिलने चला था अपनों से




मिलने चला था अपनों से बेगाने मिल गए, 
जिनकी धुनों से था बेखबर वो गाने मिल गए, 
यूँ शिद्दत से गाया उन्हें कंठ पे बिठाकर कि,
कई नयनों को भीगने के बहाने मिल गए,
हर आह पे भी जब सबकी वाह निकली,
तब क्रन्दन तो उठा चीत्कार भी हुआ,
फिर सोचा, चलो हमें  न सही वो बेगाने ही सही,
पर किसी को तो हंसी के ठिकाने मिल गए,
बस यूँ ही जीते रहे मर मर सब पर,
कहीं  गले लग कर, कहीं आँख भर कर,
कहीं डर डर कर, कहीं दम भर कर,
सोचा मुर्दा लाश को फिर तराने मिल गए,
पर भ्रम था, टूटा  गिरे कांच की तरह,
मुट्ठी खुली तो न मेले और न मंगल गीत,
हम वीराने थे और देखो फिर वीराने मिल गए...

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