Monday, February 4, 2019

गीत ऐसा हूँ जो पूरा लिख न सका

      गीत ऐसा हूँ जो पूरा लिख न सका।
      तेरी पलकों में था फिर भी दिख न सका।

1. प्यास ऐसी जो बुझ न सकी आज तक,
     एक पहेली सुलझ न सकी आज तक,
     थक चुके हैं बहुत कि न और थका। 
     गीत ऐसा हूँ...

2. एक पक्षी दरिद्र बिना पंख हूँ,
     विष्णु के हाथ मे गूंगा सा शंख हूँ,
    सिक्का ऐसा कि खोटा भी बिक न सका। 
    गीत ऐसा हूँ...

3. आँख मृग सी पर प्रकाश ही तो नहीं,
     तू दूर नहीँ तो पास भी तो नहीं,
     मैं वह फीका आम जो कभी पक ना सका। 
      गीत ऐसा हूँ जो पूरा लिख न सका।
      तेरी पलकों में था फिर भी दिख न सका।

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