Friday, March 1, 2019

भगवान शिव के मस्तक पर तीसरी आँख क्यों?







आप की मेरी हम सबकी दो-दो ही ऑंखें हैं। कल्पना करो अगर एक और आँख हमारे मस्तक पर उभर आए तो हम क्या करेंगे? क्या प्रसन्न होंगे?शायद नहीं! क्योंकि इस कारण संसार की भीड़ में हम स्वयं को बदसूरत पाएँगे। और इस बदसूरती के निवारण हेतु शायद हम तरह-तरह की cosmetic surgeries को भी आजमाएं।लेकिन यही तीसरी आँख जब हम भगवान शिव के मस्तक पर देखते हैं तो आप उन्हें बदसूरत नहीं बल्कि देव आदि देव महादेव के नाम से संबोधित करते हैं। और उनके मंगल दर्शन करते हुए उन्हें त्रिनेत्रधारी कहकर भी महामंडित करते हैं। तीसरा नेत्र अपशगुन नहीं बल्कि सबसे बड़ा शगुन एवं देवत्व की निशानी है। और ऐसा नहीं है कि यह तीसरा नेत्र भगवान् शिव के मस्तक पर ही है। बल्कि आप हम और सभी मानव तन धारी मस्तक पर जन्म से ही विद्यामान है। बस अंतर यह है के भगवान् शिव का नेत्र खुला है और हमारा बंद है। 
         कुछ लोग सोचेंगे के चलो अच्छी बात है हमारा तीसरा नेत्र नहीं खुला। वर्ना प्रलय आ जाती और हमारा घर संसार सब कुछ जलकर स्वाहा हो जाता। अगर आप भी भय से कम्पित हो गए हैं तो निश्चिन्त रहें क्योंकि तीसरे नेत्र के उद्घाटन से बाहरी जगत में कोई प्रलय नहीं आती। और भगवान् शिव के मस्तक पर भी यह तीसरी आँख  कोई बाहर नहीं बल्कि भीतर की तरफ ही खुलती है। जिससे भीतर की हमारी अज्ञानता मिथ्या परंपराओं व मान्यताओं और हठधर्मिता के बड़े-बड़े अम्बारों में प्रलय आती है, वह ध्वस्त होते हैं।आपने  शिव पुराण में "काम दहन" प्रसंग आपने अवश्य पढ़ा होगा। इसके बारे में कवि काली दास जी भी लिखते हैं- 
मनो नवद्वारनिषिद्धवृति हृदि व्यवस्थापया समाधिवश्यम। 
यमक्षरं क्षेत्रविदो विदुस्तमात्मानमात्मन्यावलोयनत्म।।
अर्थात भगवान् शिव समाधि के द्वारा अपनी मनोवृत्तियों को वश में करके उस अक्षर ब्रह्म परमात्मा को अपने शरीर में ही देख रहे थे। जिसका कि योगी जन ज्ञान अर्जित करते हैं। ध्यान अवस्था में भगवान् शिव जब प्रकाश रूप परमात्मा में विलीन थे तभी कैलाश पर काम देव का प्रवेश होता है। भगवान् शिव की समाधि भंग करने हेतु जब उसने विभिन्न प्रकार के काम बाणों को छोड़ा तो शिव अतियंत क्रोधित हो उठे। तभी उनके तीसरे नेत्र से भयंकर अग्नि की लपटें निकली और कामदेव वहीं भस्म हो गया और भगवान् शिव कामारि कहलाए। यह प्रसंग तो मात्र संकेत है। कामदेव कहीं बाहर नहीं भीतर ही जलता है। लेकिन कब जब हमारी भी तीसरी आँख खुलती है। और ईश्वर के प्रकाश में दुर्वासनाएँ जलकर भस्म हो जाती हैं और मानव काम रूप से राम रूप हो जाता है। वर्तमान काल में घटित हो रही अनाचार, बलात्कार की दुष्प्रवृतियों का कारण अनियंत्रित काम ही तो है। निर्भया काण्ड जैसी ना  याद  करने योग्य घटनाएँ इसी कामान्धता का ही तो परिणाम है। आज हमारा दुर्भाग्य देखिए केवलमात्र बड़ी-बड़ी धर्म सभाएँ, उपदेश और कथा कहानियों के द्वारा इस विश्वस्तरीय समस्या का समाधान संभव नहीं है। लेकिन भगवान् शिव कितनी सहजता से इस कामव्याधि का उन्मूलन इस तृत्य नेत्र के द्वारा कर रहे हैं।
          नवरात्रों में हम चाहे जितनी मर्जी कंजकें जमा कर उनका पूजन करें। हमारी दृष्टि में ऐसे पावनता आ ही नहीं सकती। रावण ने जगत जननी माँ सीता को इन दो नेत्रों से देखना चाहा तो मन में पाप ही तो आया। उसे हनुमान जी की तरह उनमे माँ दिखाई नहीं दी। कारण स्पष्ट है कि भगवान् राम जी के सानिध्य में रहने के कारण हनुमान जी राममय हो चुके थे एवं उनकी दृष्टि निर्मल हो चुकी थी। संतो के माथे पर सजा तिलक व त्रिपुंड भी इसी तीसरे नेत्र की और इंगित करता है।

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