Tuesday, March 19, 2019

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है



प्राचीन भारत वर्ष में अंजन मुनि नाम के एक बहुत ही परोपकारी संत निवास करते थे। उनके जीवन का अधिकतर समय दूसरों की सेवा-सुषुश्रा में ही व्यतीत होता था। जब भी कोई व्यक्ति परेशान या अभावग्रसित होता तो अपनी समस्या के समाधान हेतु अंजन मुनि जी के पास ही आता। एक बार हरि किंकर नाम का एक व्यक्ति जो कि बहुत ही आलसी स्वभाव का था। घर वालों के बार-बार कहने पर भी कोई काम नहीं किया करता था, अगर कभी किसी काम में लग भी जाता तो कुछ देर पश्चात ही काम बीच में छोड़ कर बैठ जाता। अपने इसी आलसी स्वभाव के कारण न तो वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाया और न ही किसी काम काज में लग पाया। इसलिए उसके घरवाले उसे सदा कोसते रहते थे। वह अपने परिवार के इस रवैये से काफी दुखी हो गया। इसलिए वह परेशानी के आलम में अंजन मुनि जी के पास उनके आश्रम गया। उसने आश्रम पहुंचकर उन्हें प्रणाम किया और उनके द्वारा अपनी समस्या का समाधान प्राप्त करने का इंतज़ार करने लगा। जब काफी समय बाद उसकी बारी आई तो कहने लगा, "महाराज, पूरी दुनिया में क्या ईश्वर को सिर्फ मैं ही मिला था कि उन्होंने मुझे भाग्यहीन बना कर इस संसार में भेज दिया। मैं एक असफल व्यक्ति हूँ, मैंने आज तक सफलता का स्वाद नहीं चखा। मेरे परिवार वाले भी मुझे पसंद नहीं करते।" 

            अंजनमुनि जी हरि किंकर की बात सुन कर मुस्कुरा दिए। और कहने लगे, वत्स मेरी बात ध्यान से सुनो। अगर हम इस संसार में सफलता का स्वाद चखने की इच्छा रखते हैं तो इसके लिए हमें अपनी योग्यताओं में भी वृद्धि करनी पड़ेगी। हम अपने जीवन में जितने ज्यादा गुणों को विकसित करते हैं हमारी उन्नति उतनी ही पक्की हो जाती है। लेकिन दूसरी और अगर हमारे गुण अविकसित रह जाएँगें और इसकी जगह दुर्गुण एवं बुरी आदतों को अपने जीवन का अंग बना कर रखेंगे तो हमारे जीवन की गति कुछ और ही होगी। जैसा हम चाहते हैं, हम अपना भाग्य वैसा ही लिख सकते हैं। अगर हम सच्चे मन से मेहनत करें तो अपना भाग्य बदल सकते हैं। जैसे पाणिनी ने अपने परिश्रम एवं संकल्प बल के आधार पर 
भाग्य को बदल कर रख दिया। जिस पाणिनी के बारे में उस समय के प्रसिद्ध भविष्य वक्ता ने भविष्यवाणी की थी कि पाणिनि के हाथ में विद्या की रेखा ही नहीं। वही पाणिनि को आज हम सब व्याकरण के जन्मदाता के रूप में जानते हैं। 
            अगर हम सारा दिन आलसी बने रहते हैं तो अपने भाग्य को भी दुर्भाग्य में परिवर्तित कर बैठते हैं। जो अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरंतर मेहनत करता है और अपना मनोवांछित फल प्राप्त करता है तो हम अक्सरां कहते हैं के फलां व्यक्ति बहुत ही भाग्यवान है। जबकि आलसी भरपूर योग्यताओं के होते भी परिश्रम न करने के एक ही रोना रोते हैं कि उनका भाग्य ही खराब है। जबकि यह दोनों बातें ही गलत हैं। सच तो यह है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। वह अपनी मेहनत व दृढ़ संकल्प के आधार पर ही इसे बनाता या बिगाड़ता है।"
            अंजनमुनि की शिक्षा से हरि किंकर प्रभावित हुए बिना न रह सका। उसने महर्षि के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, " हे ऋषिवर, मैं आज से ही आलस्य का त्याग करते हुए अपने जीवन में खूब मेहनत करूँगा एवं अपने भाग्य का निर्माता बनूँगा ताकि मुझे कभी भी किसी के अपमान का पात्र न बनना पड़े। ऋषिवर ने हरि किंकर को अपना पावन करकमल उठा कर तथास्तु का आशीर्वाद दे दिया। "

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