Saturday, March 2, 2019

भगवान शिव का परिवार



वर्तमान समय में आंकलन किया जाए तो अधिकांश परिवारों में कलह का वातावरण नजर आता है। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज पारिवारिक विघटन चरम सीमा पर है। न्यायालयों में धन-संपदा व आपसी झगड़ों को लेकर असंख्य केस दर्ज हैं। और ऐसा भी नहीं कि वह लोग कोई पढ़े लिखे एवं उच्च वर्ग से न हों। परन्तु उनका आचरण देखेंगे तो पशुता भी शर्मसार हो जाये। इन्हीं असमानताओं के बीच एक  परिवार ऐसा भी है जहाँ अधिकांशतः जन्म-जात शत्रुता होते हुए भी वे सभी प्रेम, सौहार्द व घनिष्टा से रहते हैं। जी हाँ! हम चर्चा कर रहें हैं भगवान शिव के अदभुत व अलौकिक पारिवारिक सदस्यों की। जहाँ विचित्रता के साथ-साथ अलौकिक पवित्रता भी है।

        हम देखते हैं के भगवान शिव के पुत्र श्री कार्तिकेय जी मोर की सवारी करते हैं। मोर दिखने में तो अत्यन्त सुंदर है और मोर पक्षी हमारे भारत वर्ष का राष्ट्रीय पक्षी भी है। लेकिन उसका सबसे प्रियतम आहार अगर जानेंगे तो शायद आपको अच्छा न लगे। जी हाँ! मोर जिसे सब से अधिक चाव से खाता है वह है सर्प। किसान वर्ग के लिए भले ही यह लाभ का सौदा हो लेकिन भगवान शिव के गले, बाजू अंग एवं शिवलिंग पर लिपटे सर्प हार निश्चित ही मोर की इस वृति से भयभीत रहते होंगे। लेकिन दिव्यता देखिए हमारे धार्मिक ग्रंथो में एक छटांक भर भी ऐसा वर्णन नहीं मिलता कि कार्तिकेय जी के मोर ने भगवान शिव के सर्प हार को निगला हो। जबकि दोनों परस्पर स्वाभाविक ही जन्म-जात शत्रु हैं।
          अब आगे अगर सर्प के भोजन की चर्चा करें तो मूषक उसे अतियंत प्रिय है। और तो और सर्प मूषक को खाकर उसी की बिल पर कब्ज़ा भी कर लेता है। अब क्योंकि मूषक गणेश जी का वाहन है। और भगवान शिव का सर्प उसे खा ले तो इस तथ्य को लेकर अवश्य ही गणेश जी और भगवान शिव में कलह उत्पन्न हो सकती है लेकिन भगवान शिव का प्रभाव देखिए कि विषैला सर्प अपनी जन्म-जात शत्रुता भूलकर भगवान शिव के परिवार में मित्रत्व वयवहार करता है।
          आदि शक्ति जगदंबा होने के कारण माँ पार्वती जी का वाहन जानते हैं क्या है? वह है सिंह! और साथ ही भगवान शिव का वाहन है बैल। अब आप सोच सकते हैं कि क्या शेर कभी बैल को जीवित छोड़ेगा? इसका उत्तर भी आप स्वयं जानते हैं। क्योंकि सिंह कभी भी अपनी हिंसक प्रवृति को नहीं त्याग सकता। अब हमने देखा कि भगवान शंकर के परिवार में सभी वाहन एक दूसरे के जन्म-जात शत्रु हैं और निम्न योनियों से सम्बंधित हैं। लेकिन फिर भी एक भी हिंसक घटना नहीं घटती। आखिर इसका कारण क्या है? तो इस सवाल का जवाब यह है कि सबने अपनी-अपनी स्वाभाविक वृतियों को एक तरफ करते हुए ईश्वरीय सत्ता का अनुपालन किया। और भगवान को ही अपना सर्वस्व व एकमात्र लक्ष्य माना। और यही वह सूत्र है जिसका इन हिंसक जीवों ने तो अनुसरण किया लेकिन मनुष्य इससे सदैव दूर भागा। जिसके परिणाम स्वरूप वह पल प्रतिपल दुःख, कलेश व निम्नता की खाई में डूबता जा रहा है।
         हम देखते हैं कि अवध में भी चारों भाई आपस में कभी नहीं झगड़ते और आज दो भाईयों का साँझा चूल्हा ढूंढ़ना भी एक कल्पना सी बन गया है। श्री भरत जी, श्री लक्ष्मण जी एवं श्री शत्रुघन जी, श्री राम जी को सिर्फ बड़ा भाई एवं राजा के रूप में नहीं देखते थे बल्कि जानते थे कि श्री राम जी स्वयं नारायण हैं। तभी तो जिस सीस पर मुकुट सजता है श्री भरत जी ने वहां खडांव धारण कर ली और रत्ती भर कलेश न हुआ। इसी प्रकार अनेकों मोती भी तब तक बिखरे रहेंगे जब तक स्वयं को एक धागे में नहीं पिरोएंगे। और भगवान शिव का अलौकिक परिवार हमें यही सन्देश देता है कि प्रभु की सेवा, आराधना व अनुसरण करने में ही जीवन का कल्याण है।

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