Thursday, March 28, 2019

मैला वस्त्र 👤 ❤




ज्ञान गंगा की नगरी काशी में ज्ञानदेव नाम के एक बहुत ही परोपकारी संत का निवास था। लोग अपनी अनेकों समस्याएँ लेकर उनके पास आते एवं उनसे सटीक समाधान प्राप्त करते। एक दिन कमल नामक एक युवा शिक्षक उनके पास आया। वह बहुत ही उदास और खिन्न नजर आ रहा था। उसके चेहरे के हावभाव पढ़ कर श्री ज्ञानदेव जी ने पूछा-वत्स आप इतने उदास क्यों हैं?आप अपनी समस्या बेहिचक हमें कह सकते हैं।
         कमल ज्ञानदेव जी के सामने हाथ जोड़ते हुए कहने लगा -प्रभु! मैं नालंदा विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षित हूँ। मेरा मन है कि मेरे नगर का कोई भी व्यक्ति आशिक्षित, अज्ञानी  न रहे। इसलिए मैं सबको निशुल्क शिक्षा देना चाहता हूँ और इसके लिए लोगों को जागरूक भी करता हूँ। लेकिन मेरे नगर कि लोग शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझते और मुझे तरह-तरह के व्यंग्य बाण कसते हैं। यद्यपि मैंने इस उच्च शिक्षा को बहुत ही कठिनाइओं से जूझकर प्राप्त किया है। लेकिन लोगों का शिक्षा के प्रति ऐसा रवैया देखकर मेरा वहां मन उचाट हो जाता है। और मेरा ऐसे लोगों को शिक्षित करने का बिलकुल भी मन नहीं करता। हे महात्मन! कृपया आप मेरी समस्याओं का उचित समाधान करें। 
कमल की बात सुनकर संत ज्ञानदेव भी गंभीर हो गए और कहने लगे -"कमल पुत्र एक बात बताओ। आपने जो वस्त्र धारण किये हैं क्या आप इन्हें फिर से बिना साफ़ किये पहन सकते हो?"
कमल ज्ञानदेव जी का ऐसा प्रश्न सुनकर चौंक गया, " महाराज, यह कपड़े तो धुल मिट्टी के कारण गन्दे हो गए हैं। इसलिए इन्हें बिना धोए स्वच्छ तन पर फिर से धारण नहीं किया जा सकता।"
ज्ञानदेव जी ने दूसरा प्रश्न किया-"साफ़ कपड़ों को यदि एक बार फिर से धोने के लिए बोला जाये तो फिर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?"
हे प्रभु ! धुले हुए कपडे तो पहले से ही साफ़ हैं। उन्हें दुबारा धोने के आवश्यकता नहीं, क्योंकि अगर मैं ऐसा करता हूँ तो अपना समय, साधन, प्रकृति सभी का ही हनन करूँगा। क्योंकि मैले कपड़ों को धोना ही ज्यादा जरूरी होता है, साफ़ को नहीं।
ज्ञानदेव कहने लगे, "पुत्र, आप सही उत्तर दे रहे हैं। जिस प्रकार साफ़ कपड़ों की धुलाई जरुरी नहीं, ठीक इसी प्रकार से जो लोग सुधरे हुए हैं, शिक्षित हैं उन्हें कुछ भी सिखाने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि सुधार उन लोगों के लिए जरुरी है, जो अज्ञानता में जकड़े हुए हैं, क्योंकि वह उस मैले वस्त्र के समान हैं, जिनको धोना बहुत ही जरुरी है। पुत्र आपका नाम कमल है जो गंदगी में खिलकर भी उससे अछूता रहता है। अपने नाम के अर्थ को सार्थक करते हुए आपको अंधकार में फंसे लोगों की मल को साफ़ करना चाहिए जो इस अज्ञान से छूट कर शिक्षा रुपी ज्ञान प्रकाश को प्राप्त करना चाहते हैं। और लोग कुछ भी कहें आपने अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होना है। क्योंकि अच्छे काम में बाधाएँ रास्ता न रोकें ऐसा कभी नहीं हो सकता। इसलिए पुरे उत्साह एवं लग्न के अपने कार्य में जुट जाओ। 
संत ज्ञान देव जी का उपदेश सुनकर कमल कहने लगा-प्रभु, मैं आपके आशय को समझ चुका हूँ। अब मैं आपके द्वारा बताए मार्ग के अनुसार ही लोगों में जागरूकता का प्रसार करूँगा।

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