Sunday, March 31, 2019

प्रायश्चित 💗अमृत जल💧है



एक बार एक जिज्ञासु भारत के महान संत सतगुरु स्वामी रामानंद जी की शरण में आया और उनके चरणों में अपने मन में उठी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उनसे सवाल किया, "हे महात्मन! मैं जानता हूँ कि मनुष्य अपने कर्मों के अधीन है। और इस संसार में रहते हुए उससे जाने-अनजाने अनेकों ही ऐसे कर्म हो जाते हैं जो पाप की श्रेणी में आते हैं। प्रभु आप मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं अपनों पापों से मुक्ति कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?"
         उस जिज्ञासु भक्त की बात सुनकर स्वामी रामानंद जी कहने लगे, "मनुष्य मन, वचन व कर्म के द्वारा अगर पाप में लिप्त न होने का संकल्प ले, और भूतकाल में जो पाप हो गएँ हैं अगर उनका सच्चे मन से प्रायश्चित करे तो व्यक्ति के मन की निश्चित रूप से शुद्धि हो सकती है और उसका अन्तःकरण निर्मल हो सकता है। 
         स्वामी रामानंद जी की बात सुनकर जिज्ञासु कहने लगा,"प्रभु, क्या प्रयाश्चित करने से सचमुच पापों से मुक्ति मिल सकती है? अगर आपका यह वचन सत्य है तो कैसे?"
         उसका प्रश्न सुनकर स्वामी रामानंद जी उक्त जिज्ञासु को अपने साथ नदी के पास ले गए। नदी के पास किनारे में एक बहुत बड़ा गड्ढा था। जिसमें पानी सड़ चुका था, उसमे कीड़े रेंग रहे थे और उस गड्ढे से भयंकर बदबू उठ रही थी। स्वामी जी उस व्यक्ति को ये सड़े पानी वाला गड्ढा दिखा कर कहने लगे, "वत्स, क्या तुम जानते हो कि ये पानी क्यों सड़ गया है?"

        उस जिज्ञासु को उनके कथन में छुपा रहस्य समझ नहीं आया वह कुछ देर पानी को देखता रहा और कहने लगा, "गुरुदेव! मुझे लगता है कि एक ही जगह खड़े रहने के कारण पानी सड़ांध मार रहा रहा है। इस जल का प्रवाह रुकने के कारण ही इसमें कीड़े चल गए हैं।" 
        स्वामी जी कहने लगे, " पुत्र! आप बिलकुल सही कह रहे हैं, जैसे पानी एक जगह इकठ्ठा होने से सड़ांध मार रहा है ठीक इसी प्रकार प्रायश्चित के अभाव में पाप इकठ्ठा होकर मनुष्य का अनिष्ट करते हैं। जिस तरह नदी कर निरंतर प्रवाह उसे साफ़ स्वच्छ बनाए रखता है, ठीक इसी प्रकार प्रायश्चित के समान है जो सब तरह के पापों को धोकर उसके मन व आत्मा को स्वच्छ कर उसे अपने लक्ष्य की और अग्रसर करता है। जिज्ञासु भक्त स्वामी जी के द्वारा बताए गए प्रायश्चित के महत्त्व को समझकर उनके वचनों को अनुसार अपना जीवन चलाने के लिए अपने मार्ग पर आगे बढ़ गया। 

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