Sunday, March 17, 2019

चंचल मन पर विजय



एक बार स्वामी राम तीर्थ जी अपने कॉलेज से घर वापिस आ रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक फल वाले को बहुत ही अच्छे ताज़े अमरुद बेचते देखा। हरे-हरे सुंदर अमरुद देखकर स्वामी जी का चंचल मन पुलकित हो गया एवं वे फल वाले के ठेले के पास पहुँच गए। और अमरुद का दाम पूछने लगे। तभी उनके मन ने कहा के मेरी यह जिह्वा इतना क्यों ललचा रही है? इसकी बात बिलकुल भी नहीं माननी चाहिए। इसलिए वह अमरुद का दाम पूछ कर आगे बढ़ गए।
            कुछ दुरी पर पहुंच कर उन्होंने सोचा कि जब मोल ही पूछ लिया तो इन्हें खरीदने में क्या में क्या बुराई है? इसी उहापोह में कभी वह आगे बढ़ जाते कभी वापिस ठेले वाले के पास आ जाते। फल विक्रेता भी उन्हें बार-बार ऐसा करते  देख रहा था। आख़िरकार स्वामी रामतीर्थ जी ठेले वाले के पास आए और ललचाई नजरों से अमरूदों को देखने लगे। उनके इस व्यवहार को देखकर फल वाला कहने लगा-"साहब! अगर आपका अमरुद खाने इतना ही मन है तो आप इन्हें  खरीद ही क्यों नहीं लेते? इस तरह बार-बार आगे पीछे क्यों आ, जा रहे हैं?" ठेले वाले की बात मानकर उन्होंने उससे कुछ अमरुद खरीदे और अपने   घर की और चल दिए। अपने कमरे में पहुँच कर उन्होंने अमरुदों को एक तरफ रखा लेकिन उनका पूरा ध्यान इन्हीं की और लगा था। 

इसलिए वह रसोई घर से चाकू लाए और एक अमरुद को काट लिया। अमरुद काटते समय भी उनका मन इसे खाने के लिए बुरी तरह ललायत हो रहा था, लेकिन स्वामी राम तीर्थ जी स्वयं से बोले-"किसी भी कीमत पर इस चंचल मन को अमरुद खाने से रोकना है। मैं भी देखना चाहता हूँ कि मैं अपनी जिह्वा का गुलाम हूँ या फिर मेरा मन इस पर विजय प्राप्त कर सकता है। अमरुद को काटकर उन्होंने अपने सामने प्लेट में रख लिया। और अपने मन पर अंकुश लगाते हुए इसे खाने से रोकने लगे। 

इस प्रकार काफी समय व्यतीत हो गया, धीरे-धीरे कटा हुआ अमरुद मुरझाने लगा लेकिन स्वामी जी ने इसे हाथ तक नहीं लगाया। मन और जिह्वा की इस जंग में आखिरकार उनका मन जीत गया था। इसलिए वह प्रसन्न होकर स्वयं से कहने लगे, "आखिर मैंने अपनी रसिक जिह्वा पर विजय प्राप्त कर ही ली। सुंदर अमरुद रंगहीन, स्वाद हीन हो गया, लेकिन मैंने उसका स्वाद नहीं चखा।" इसके उपरांत वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने अन्य कामों में व्यस्त हो गए। 

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