Saturday, March 9, 2019

मनुष्य या मशीन?




मानव और मशीन में क्या अंतर है? आप मशीन को प्यार भरा गुलदस्ता भेंट करके देखिए। इसके बाद आप उस पर बहुत सारी गालियों की बौछार करके देखना। क्या वह किसी तरह रिएक्ट करेगी? क्या हमारे व्यवहार के input से उसके output पर कोई फर्क पड़ेगा? कदापि नहीं ! पर इस मशीन की जगह यदि मनुष्य हो तो? उस पर बहुत फर्क पड़ता है। आपका बदलता व्यवहार उसके मूड को On-Off कर सकता है। दो कड़वे बोल उसके मूड--मीटर के ग्राफ को नीचे गिरा देते हैं। वहीं दो मीठे बोल उसे ऊपर उठा देते हैं। थोड़ा सा प्यार पाकर कई बार इंसान वह कर गुजरता है, जो उसकी क्षमता से बाहर होता है। ऐसा अंतर क्यों? क्योंकि इंसान भावनाओं (emotions) का पुतला है। उसके हाथ-पाँव केवल मस्तिष्क के command पर machine की तरह काम करते हैं। उसके भीतर एक धड़कता दिल भी है, जिसमें भाव लहरें हिलोरें लेती हैं। और मजे की बात तो यह है कि इन भावनाओं के सामने मस्तिष्क के कमांड भी धरे के धरे रह जाते हैं।
       उदाहरण के तौर पर, क्रिकेट के मैदान में एक बल्लेबाज ने बल्ला घुमाया। गेंद फिरकी की तरह घूमती हुई उड़ने लगी। सामने खड़ा फील्डर उसकी और लपका। इस क्रम में वह जोर से कंधे के बल गिर गया। उसके कंधे की हड्डी चटक गई। अब ज़ाहिर है कि उसके मस्तिष्क ने तो दर्द का signal दिया। पर कैच की ख़ुशी की भावना दर्द के signal के ऊपर भारी पड़ गई। इस भावना के अतिरेक में फील्डर ने एक बार तो टूटे कंधे से गेंद उछाल दी। लेकिन बाद में उसे इस दर्द का एहसास जरूर होता है।
     दूसरी मिसाल लेते हैं। अगर आपको कोई 10 kg का डिब्बा देकर कहे कि इसे 5वीं मंजिल पर लेकर जाना है तो शायद आपकी हिम्मत पड़े। लेकिन यदि आप अपने 10kg के बच्चे को उठाकर 5वीं मंजिल पर जाते हैं तो आपको कोई problem नहीं होती। इसका कारण है कि आपकी भावनाओं के तार अपने बच्चे से जुड़े हैं। जिसके कारण आपको उसके भार का एहसास तक नहीं होता।
      उक्त उद्धरण हमें भावनाओं की शक्ति के प्रभाव को दिखाते हैं। पर यहाँ एक point देखने लायक है। जब तक यह भावनाएँ सीमा में रहती हैं, तब  ठीक है। पर जहाँ ये सीमा पार करके अतिशय हो जाती हैं तो वहाँ समस्या खड़ी कर देती हैं। एक भावुक इंसान सिर्फ अपना बल्कि अपने सम्पर्क में आने वालों का भी जीना दूभर कर देता है। छोटी-छोटी बातों पर बेवजह sentimental जो जाया करता है। इनके साथ अपनी भावनाओं को जोड़कर उन्हें मान-अपमान का विषय बना लेता है। वह और क्या करता है जानने के लिए उसकी चरित्र फिल्म के कुछ clips देखते हैं।

Microscopic Thinking-हम सब ने अपने बचपन में एक कहानी सुनी थी। एक बार एक लोमड़ी एक पेड़ के नीचे सुस्ता रही थी। एकाएक ज़ोर का धमाका हुआ। उसके कान खड़े हो गए। वह हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई। उसने दाएं-बाएं देखा पर कुछ दिखाई दिया। चतुर लोमड़ी का मस्तिष्क मनकने लगा- ''इतनी विस्फोटक ध्वनि! जरूर आस्मां टूट टूटकर गिर रहा है। अब मुझे ही सब नासमझ पशुओं को सुचेत करना पड़ेगा!'' बस फिर क्या था, वह दौड़ पड़ी और  पूरे जंगल की परिक्रमा करते हुए शोर मचाने लगी- 'भागो-भागो... आसमान गिर रहा है...'
           आप जानते ही है कि वास्तव में हुआ क्या था? लोमड़ी के सिर के पास सेब के पेड़ से एक सेब टूटकर गिरा था। और इसी सेब गिरने की आवाज को उसने नींद में धमाका समझ लिया था। 
        भावुक लोगों की दशा ठीक इस लोमड़ी के सदृश होती है। जरा सी बात पर वे ऐसा हंगामा मचा देते हैं, मानो सिर पर आसमान गिर पड़ा हो। ऐसा लगता है, उनकी सोच में एक Microscope फिट है। थोडा सा कुछ हुआ नहीं कि उनका यह यंत्र तुरंत हरकत में गया। और छोटी सी बात को भी बस बढ़ा-चढ़ा कर रख दिया। मानव की इसी सोच को बताते हुए एक दार्शिनक कहते हैं-'Sentimental Beings often give small thing a big shaddow. '

Touch me Not- आप एक छुईमुई के पौधे को touch करके देखना। स्पर्श करते ही वह सकुचा और कुम्हला जाएगा। भावुक लोग भी इसी तरह के touchy nature के होते हैं। वे हर बात को दिल से लगा बैठते हैं। और एक क्षण में ही मायूस हो जाते हैं। ऐसे छुईमुई type के लोगों को छेड़ने से भी डर लगता है। पता नहीं किस बात पर रुष्ट हो जाएँ या रो पड़े। लोग इनसे वार्तालाप करने से पूर्व 100 बार सोचते हैं। कि इनसे बात करें या न। बहुधा तो इनसे कतरा कर रास्ता काटना ही बेहतर समझते हैं।

घाव को नासूर बना लेते हैं-क्या आप जानते हैं कि जब एक बंदर को चोट लगती है, तो वह है क्या करता है? निरंतर खुजाता रहता है और खुजा-खुजा कर उस छोटी सी चोट को गहरा जख्म बना लेता है। फिर भी खारिश करना बंद नहीं करता। परिणामतः एक दिन यही जख्म उसके लिए प्राणघातक नासूर बन जाता है। 
      ठीक ऐसी ही अविराम खुजली एक भावुक इंसान अपने मानसिक घावों पर करता है। एक छोटे से अपमान को कुरेद-कुरेद कर जख्म बना लेता है। जो अत्यधिक जज़्बाती होते हैं, वे तो बेइन्तिहाँ मानसिक खुजली पर उतारू हो जाते हैं। इस क्रम में कई बार अपमान में अपनी जान तक गँवा बैठते हैं।
  इसलिए इन सबसे बचने के लिए दूसरों को छोटी सी बात के मनमाने अर्थ निकालना छोड़ दीजिए। अपने microscope से उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर मत देखिए। एक विचारक ने हमें एक बहुत ही अच्छी हिदायत दी है-Try to distinguish mole hills from mountains भाव एक पर्वत और चूहे के टीले में फर्क करना सीखें।इसलिए अपने जीवन का Remote control दूसरों के हाथ में मत दें। किसी के व्यवहार अनुसार अपना मूड on-off करें। नकारात्मक सोच का परित्याग करते हुए आशावादी बनें। 
  उपरोक्त विचारों का अर्थ यह भी नहीं कि आप पत्थर दिल बन जाएँ। अपने शुभ-चिंतकों की भावनाओं और सुझावों को बिल्कुल ही नज़र-अंदाज कर डालें। भावुकता से विहीन होना हृदयहीनता नहीं है। इसलिए अध्यात्म दर्शन की फिलॉसफी है कि जीवन में भावुक नहीं, लेकिन संवेदनशील जरूर बनें।

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