Saturday, June 1, 2019

ऐ ज़िन्दगी



ऐ ज़िन्दगी तू भी कितनी, घनी बौर है ।
बड़ी सुंदर है बस ये तो, बेवजह ही शोर है।


हँसते फ़ूलों तले हैं काँटे देखा करो,
छुपके ठहाकों के पीछे ना घुटके मरो।
टूटा पेड़ अनाथ बताओ कहाँ ठौर है।

कोख़ में पल कर कोख़ के बैरी लगभग हैं।
बेगानों को छोड़ो रे अपने ही ठग हैं।
सर्प आहारी फिर भी राष्ट्रीय पक्षी मोर है।

मित्र कई पर अपना तो सगा दुश्मन था,
कम से कम भीतर बाहर एक ही मन था।
दिखलाना तो था ही, जिस में जितना ज़ोर है। 
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