Wednesday, June 12, 2019

देश प्रेम





भारत देश से प्रेम करो
लगभग 72 सालों से आज़ाद भारत! क्या सच में ही आज़ाद है? आज हमारे देश के अंदर अधर्म, अनाचार,अत्याचार,भ्रष्टाचार ने सुरसा की भांति अपना कभी भरने वाला विशाल मुख खोल रखा है। देश का हर बाशिंदा आज आतंक के माहौल में डरी-सहमी साँसे भर रहा है। दया,धर्म, हया,शर्म जैसे गरुड़ के पंख लगा कर दूर की उड़ान भर गयी है। मनुष्य के सारे सद्गुण और आदर्श जैसे काफूर हो गए हैं। जिस देश में नारी को गृह लक्ष्मी कह कर सम्मान दिया जाता था। आज उसी के गर्भ के अंदर पल रही मासूम बालिका के भ्रूण का गर्भपात करवा दिया जाता है। क्या हमारे देश भक्तों और शहीदों ने ऐसे बिखरे-रस विहीन भारत का सपना संजोया था?क्या राजगुरु भगत सिंह और सुखदेव ऐसे भारत के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए थे?
अफ़सोस आज हम अमर शहीदों के बलिदानी किस्से भूल चुके हैं। उन वीरों के अंदर क्या फौलादी जज़्बा था! उसे जानते हुए भी कही गहरा दफ़न कर आएँ हैं। एक बार चंद्र शेखर आज़ाद जी के माता-पिता जी के लिए किसी ने कुछ रुपए दिए थे। लेकिन पार्टी को किसी बहुत ही जरुरी काम के लिए रुपयों की आवश्यकता हुई, तो उन्होंने सारा धन पार्टी की मदद हेतु दे दिया।
 
ठीक इसी प्रकार शहीद राजगुरु जी के जीवन की एक घटना हमारा दिल दहला कर रख देगी। एक बार जब वो अपने साथी क्रांतिकारों के लिए भोजन बनाने बैठे, तो उन्होंने सँडासी अँगीठी पर गर्म होने के लिए रख दी। लेकिन वह इसे रख कर भूल गए और अपने एक साथी के साथ बातों में मशगूल हो गए। वह सचमुच भूले थे या फिर भूलने का नाटक कर रहे थे यह तो हम बाद में ही जान पाएंगे। खैर! अँगीठी पर सँडासी गर्म हो रही थी, जब खूब लाल हो गई तो,राजगुरु जी ने उस जलती हुई सँडासी को अपने छाती पर तीन जगह लगा लिया। उनके साथी क्रन्तिकारी ने तेजी से लपककर उनके हाथ से सँडासी छुड़ाई और पूछने लगा-' अबे, यह क्या मूर्खता कर रहा है?अपने आप को जला क्यों रहा है?तू जानता नहीं भारत माता को अंग्रेजों की कैद से छुड़वाए बिना तो हम चैन से मर भी नहीं पाएंगे?'
तो राजगुरु जी अपने साथी से कहने लगे-'मैं खुद को परख कर देख रहा था कि कहीं मैं फिरंगियों के टार्चर के सामने विचलित तो नहीं हो जाऊँगा! मैं शुक्रगुजार हूँ, मेरी भारती माता का जिसने मुझे इतना सी सहनशक्ति तो दी है कि मैं फिरंगी का मुँह तोड़ सकूँ!' 

सचमुच हमारे देश भक्त किसी और ही मिट्टी से घड़े हुए थे। लेकिन अफ़सोस आज हम अपने देश के वीरों की महान कुर्बानियों एवं त्याग को मन से बिसार चुके हैं। हम उन्हें भूल गए हैं, जिन्होंने फांसी की माला में हँसते हुए अपने गले पिरो दिए थे कि हम जैसी आने वाली पीढ़ियां आज़ाद फ़िज़ा में साँस ले पाएं। वे इस बात से भलीभांति परिचित थे कि वे अपनी मौत को पुकार रहे हैं। फिर भी अपने बुलंद हौंसले के पंखों पर सवार होकर उन्होंने उत्पीड़क सत्ता को ललकारा और अपने खून से इस आज़ादी की मशाल को प्रदीप्त किया था। अपने खून से इस आज़ादी के पौधे को सींचा था, लेकिन हम कितनी आसानी से उनके तप, त्याग,बलिदानों को भूल गए हैं। इसके बारे में लिखते हुए कवि नागार्जुन कहते हैं -
कृतकृत्य नहीं जो हो पाये,
प्रत्युत फांसी पर गये झूल।
कुछ दिन ही बीते हैं, फिर भी ,
यह दुनिया जिनको गयी भूल.
उनको प्रणाम !
इसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द जी जिन्होंने भारतीय संस्कृति एवं अध्यात्म की पताका को देश विदेश में फहराया था। परन्तु एक सन्यासी के रूप में विवेकानंद जी पूर्णतः देश एवं देश सेवा को समर्पित थे। वे भारत को उन्नति के शिखर पर देखना चाहते थे। जब वे भारत के आध्यात्मिक सन्देश को लेकर अमेरिका में प्रचार करने गए तो इस यात्रा के दौरान, मैकलाईट नाम की एक अंग्रेज महिला उनके व्यक्तित्व और शिक्षाओं से बेहद प्रभावित होती है। उसने विवेकानंद जी से कहा-'स्वामी जी, मैं आपकी विचारधारा और शिक्षाओं से प्रभावित हूँ और मैं आपके इस पवित्र मिशन के लिए अपना बनता सहयोग प्रदान करना चाहती हूँ। आप बताएँ के मैं आपकी सहायता किस प्रकार से कर सकती हूँ?'
स्वामी विवेकानंद जी ने जब उस महिला के मुख से यह सुना तो उनकी रगों में हिलोरे ले रहा आगाध देश-प्रेम वाणी बन कर बहने लगा। उन्होंने उस महिला को सिर्फ एक ही पंक्ति में उत्तर दे दिया, 'मेरे भारत देश से प्रेम करो।' इसी प्रकार जब वे इंग्लैंड से भारत वापिस रहे थे,  तो एक अंग्रेज़ ने उन्हें बड़ी शान से प्रश्न किया-'आप विगत 4 साल से विदेश में रह रहे हैं। इन देशों का वैभव, तरक्की एवं समृद्धि का अनुभव कर लेने के बाद, जब आप वापिस इंडिया जाएँगे तो आपको अपनी भूमि कैसी प्रतीत होगी?'
स्वामी जी उस अंग्रेज़ का बचकाना सवाल सुनकर मुस्कुरा पड़े एवं उत्तर स्वरुप उन्होंने जो कहा, वह इतना मार्मिक, गहरा और स्पष्ट था कि जिसे पढ़कर प्रत्येक भारतवासी बरबस ही उनकी देश भक्ति को सलाम कर उठेगा। उन्होंने कहा, 'विदेश आने से पूर्व मैं अपने देश भारत से सिर्फ प्रेम करता था, परन्तु अब मेरे लिए मेरे देश की भूमि का कण-कण वंदनीय एवं पूजनीय है। मेरे देश में बहने वाली वायु पावन है;मेरे लिए मेरा देश सिर्फ एक पुण्य भूमि,एक महान तीर्थ स्थान है।'
 
प्यारे पाठकों स्वामी जी के मुखारविंद से निकले शब्द कोई कोरे शब्दों का पुलंदा या सुंदर अलंकारिक व्याख्या नहीं बल्कि यह तो उनकी अपने देश के लिए शुद्ध पवित्र भावनाएँ थी। उनकी यही भावनाएँ पाश्चात्य देशों में दिए गए उनके व्याख्यानों में भी स्पष्ट गूँजती थी।
परन्तु अफ़सोस! न ही हमारे अंदर ऐसा देश प्रेम है और न ही देश के हित के लिए ऐसी निश्छल भावनाएँ। शायद यही कारण है के हमारा देश भारत वैसा नहीं बन पाया जैसा देश भक्तों ने अपनी जान पर खेलते हुए इसे बनाने का सपना सँजोया होगा। इसलिए हम आज स्वामी विवेकानंद जी की तरह कभी नहीं कह पाएँगे की मेरे भारत देश से प्रेम करो। आएँ हम कुछ चिंतन करें। अपने देश की महान धरोहर इसकी सभ्यता संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों की रक्षा और पालन करने का संकल्प लें ताकि हमारे महापुरुषों, देशभक्तों को पश्चाताप न हो के उन्होंने हम जैसे निकम्मे लोगों के लिए अपने प्राण क्यों व्यर्थ किये।

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