Tuesday, June 18, 2019

महापुरुषों की अखंड देश भक्ति



यह घटना सन् 1872  दिसंबर की है। वेदों का जोर शोर से जुटे हुए स्वामी दया नन्द सरस्वती जी उस समय कलकत्ता में थे। यहाँ उनकी मुलाकात वायसराय लार्ड नार्थ ब्रुक से हुई। उसने स्वामी जी को कुछ मक्खन लगाते हुए कहा, 'स्वामी जी! हम आपके इन प्रेरणादायक भाषणों से बहुत खुश हैं। आपको सुनने के लिए हज़ारों ही लोग आते हैं।'अपना कपट मीठे शब्दों में छुपाते हुए कहने लगा-बस आपसे एक ही गुज़ारिश है कि आप अपने भाषणों के अंत में एक हमारे अखंड शासन के लिए भी जरूर कुछ प्रार्थना किया करें कि अंग्रेजों का शासन भारत में मजबूत और चिरकालिक हो। इससे आपका प्रचार भी चलता रहेगा और हमारा काम भी सदा बना रहेगा।'
यहाँ हम स्वामी दया नन्द जी की अखंड देश भक्ति को तो क्या शब्द दे सकते हैं। दरअसल भारत को  'स्वतंत्रता' शब्द तक की दें भी उन्होंने ही दी है। इसलिए उन्होंने सीना ठोककर निधड़क होकर दो टूक उत्तर देते हुए कहा-'वाइसराय जी!अंग्रेजों के लिए अखंड शासन की प्रार्थना तो बहुत दूर की बात है, मैं तो प्रति क्षण, प्रतिपल, प्रतिदिन अपनी हर साँस के साथ प्रभु के चरणों में एक ही प्रार्थना करता हूँ कि मेरे देश से आपके शासन का शीघ्र अति शीघ्र नाश हो ताकि मेरे देश के लोग आज़ाद पवन में मुक्त साँस ले सके। आपके क्रूर चंगुल से छूट कर ही मेरे देश के लोग अपनी खोई हुई गरिमा फिर से प्राप्त कर सकेंगे। और मेरा देश फिर से सम्पूर्ण विश्व में अपनी ओजस्वी पहचान बना सकेगा।'


इसी प्रकार स्वामी राम तीर्थ जी जापान से वापिस आने के बाद अपने श्रद्धालुओं को अक्सर वहाँ का एक प्रसंग सुनाया करते थे, जब मैं जापान में था तो अक्सरां किसी किसी मास्टर की अपने विद्यार्थी से यही वार्तालाप होती थी-
मास्टर (विद्यार्थी से)-आपकी उम्र क्या है?
उत्तरस्वरूप विद्यार्थी अपनी उम्र बता देता। मास्टर पुनः प्रश्न पूछता-तुम इतने बड़े कैसे हुए?
विद्यार्थी-जी, खाना खाने से और अच्छे पौष्टिक खान पान से!
मास्टर फिर विद्यार्थी को अगला सवाल करता कि वह खुराक कैसे पैदा हुई?किस धरती ने उस खुराक में पोषण भरा?
विद्यार्थी-मास्टर जी!यह सब कुछ  मेरे देश जापान की धरती पर पैदा हुआ।
मास्टर अपनी विद्यार्थी के उत्तर से संतुष्ट होता बल्कि उससे अगला प्रश्न कर देता और कहता,यानि तुम्हारा शरीर जापान की धरती पर उपजे अन्न से फला-फूला है। और यदि आप कहेंगे की मेरा शरीर मेरे माता पिता की देखभाल के कारण ही हृष्ट-पुष्ट है तो वह भी तो आपको सब कुछ जापान की भूमि से ही उपलब्ध करवा रहे हैं। क्योंकि आपके माता पिता भी अपने देश की बदौलत ही जीवित हैं। मैं सही बोल रहा हूँ ?
विद्यार्थी-जी हाँ मास्टर जी!आपका कथन पूर्णतः सही है।
मास्टर-अगर जापान आपको खाने के लिए अन्न देता, तो आप आज इस प्रकार फले-फूले होते।
विद्यार्थी-मास्टर जी! हो सकता है  मैं जीवित ही होता।
मास्टर पुनः अपने विद्यार्थी से सवाल करता तो क्या फिर आपके देश जापान को आप यह अधिकार देते हैं कि आवश्यकता पड़ने पर तुमसे तुम्हारा शरीर मांग ले? फिर तुम कोई आना कानी तो नहीं करोगे?
विद्यार्थी-मास्टर जी!मैं कतई ऐसा नहीं कर सकता,क्योकि मेरे शरीर पर मुझसे ज्यादा मेरे देश जापान का अधिकार है। अपने देश हिट के लिए मैं किसी भी प्रकार की कोई भी क़ुरबानी देने से कभी पीछे नहीं हटूँगा ....
स्वामी जी इतना कह कर थोड़ा थम जाते हैं और कहते हैं कि इस प्रकार प्रत्येक जापान वासी की रगों में अपने देश  के लिए मर मिटने का जुनून बचपन में ही भर दिया जाता है। इसी कारण जापान के लोगों में अपने देश पर मर मिटने का अपार जज़्बा होता है। 

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