Sunday, June 2, 2019

पृथ्वी पर भार


महर्षि वेदव्यास जी जिन्हें जगद्गुरु की उपाधि से संबोधित किया जाता है। द्वैपायन द्वीप में तपस्या करने तथा इनके शरीर का रंग काला होने के कारण उन्हे कृष्ण द्वैपायन भी कहा जाता है। वेदों का विस्तार करने के कारण ही इनका नाम वेदव्यास पड़ा। चूंकि वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ था इसलिए गुरु शिष्य का महान पर्व, गुरु पूर्णिमा पर्व भी व्यास जी की जयन्ती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास जी ने समस्त संसार में ज्ञान, भक्ति, सदाचार, सत्य जैसे सद्गुणों पर चलने की प्रेरणा दी। त्रिकालदर्शी होने के कारण इन्होंने कलियुग की स्तिथि के बारे में जान लिया था। इसलिए इन्होंने वेदों का विस्तार करके इस धरा पर ज्ञान की पवित्र भागीरथी प्रवाहित की। और संपूर्ण मानव समाज को शुभ आचरण एवं भक्ति, ज्ञान, साधना जैसे सद्गुणों को धारण करने की शिक्षा दी। वह कहते है कि मनुष्य को क्षमा, शीलता, सत्य,सरलता,करुणा, अहिंसा, संयम एवं सदा प्रसन्न रहते हुए मधुर बर्ताव करना चाहिए। मनुष्य को मानव मात्र के लिए उदार चित्त होना चाहिए। वह अपने शिष्यों को समझाते हुए कहते हैं, 'सत्य से पावन हुई वाणी का वहन करें एवं जो आपको अपने मन, वचन, कर्म से पवित्र जान पड़े सदैव उसी का ही आचरण  करें। झूठ, छल-कपट, चरित्रहीनता, परस्त्री गमन, मांस-मदिरा एवं धर्म के विरुद्ध आचरण न करें। क्योंकि जो प्राणी धर्म के विरुद्ध आचरण करते हैं उनके कुल के लोग बीमार, बलहीन एवं तेज रहित होने के कारण उनका शीघ्र ही नाश हो जाता है।'

वेदव्यास जी माता पिता की सेवा करने की लिए प्रेरणा देते हैं। वह समझाते हैं के जो दुष्टबुद्धि लोग अपने माता पिता को कष्ट देते हैं उनका जीवन भी नारकीय हो जाता है। ऐसे लोग सदैव ही मानसिक एवं शारीरिक कष्टों से ग्रसित रहते हैं। उनका इहलोक और परलोक दोनों बर्बाद हो जाते हैं। इसलिए सबके प्रति समभाव रखते हुए अपने जीवन को सफल करें। उन्होंने भगवान के भजन को महा यज्ञ कह कर सम्बोधित किया है।इसलिए वह कहते हैं, जो दुष्ट लोग अपनी कपट बुद्धि के कारण दान और सेवा नहीं करते और इसमें विघ्न उत्पन्न करते हैं, दीन-हीन, दरिद्र, अनाथ को पीड़ा देते हैं, वह मूलतः दुष्ट प्रवृति के होते हैं। और ऐसे लोग इस पवित्र पृथ्वी पर भार ही हैं।'

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