Tuesday, June 25, 2019

बेटी

माँ-बाप जब जन्म देते हैं एक बेटी को,

हर अपनी ख़ुशी देते हैं उस बेटी को,

रखते हैं फूलों की सेज पर उसको,

कांटा तक चुभने नहीं देते उसको।

जब यही कली बन जाती है फूल,

तो क्यों तोड़ ले जाते हैं लोग।

क्यों कहते हैं लोग बेटी को धन पराया,

क्यों भेजते हैं उसे घर पराए।

किसने बनाई है ये रस्में विदाई की,

पहले जन्म और फिर क्यों दी जाती है विदाई।

जिस बेटी को अपनी पलकों पे बिठाया था,

जिसके लिए ख्वाबों को आँखों में सजाया था।

क्यों पल भर में करना पड़ता है पराया उसे,

क्यों करना पड़ता है अनजान के हवाले उसे।

क्यों दिल पे पत्थर रखना पड़ता है माँ-बाप को,

क्यों निभानी पड़ती हैं रस्में उनको।

क्यों देनी पड़ती हैं कुर्बानी उनको,

क्यों झुकना पड़ता है दुनिया के आगे उनको।

जब होती है शादी बेटी की,

तो चेहरे पर ख़ुशी और दिल में ग़म होता है उनके।

निभाते रहते हैं वे रस्में हँसते-हँसते

और उधर होता है कलेजा टुकड़े-टुकड़े।

इधर टूटता है दिल माँ-बाप का,

उधर सूखते नहीं आँसू बेटी की आँखों के।

आज पूछता है रब से बेटी का दिल ,

क्या पिघलता नहीं यह देख खुदा का दिल।
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