Tuesday, June 4, 2019

पेड़ हों तो बैकुंठ भी धरा सा नहीं





कुछ हरा सा नहीं, दिल भरा सा नहीं,
पेड़ हों तो बैकुंठ भी धरा सा नहीं।
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छाँव मिलती नहीं गंजे मैदान हैं,
बाग थे जो भरे आज वीरान हैं।
धरती का सौंदर्य अब अप्सरा सा नहीं।
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वायु की ये तपिश कुछ है समझा रही,
गीत रूदन से प्रेरित कोई गा रही ।
सुन के फिर भी क्यूँ मानव डरा सा नहीं।
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कुएँ सूख रहे सूखी सरितायें हैं,
भाव शून्य सी जैसे ये कवितायें हैं। 
जो है सौदा किया वो ख़रा सा नहीं ।
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