Thursday, June 6, 2019

स्वामी राम तीर्थ जी



स्वामी राम तीर्थ जी जापान से वापिस आने के बाद अपने श्रद्धालुओं को अक्सरां वहाँ का एक प्रसंग सुनाया करते थे, जब मैं जापान में था तो अक्सरां किसी किसी मास्टर की अपने विद्यार्थी से यही वार्तालाप होती थी-
मास्टर (विद्यार्थी से)-आपकी उम्र क्या है?
उत्तरस्वरूप विद्यार्थी अपनी उम्र बता देता। मास्टर पुनः प्रश्न पूछता-तुम इतने बड़े कैसे हुए?
विद्यार्थी-जी, खाना खाने से और अच्छे पौष्टिक खान पान से!
मास्टर फिर विद्यार्थी को अगला सवाल करता कि वह खुराक कैसे पैदा हुई?किस धरती ने उस खुराक में पोषण भरा?
विद्यार्थी-मास्टर जी!यह सब कुछ  मेरे देश जापान की धरती पर पैदा हुआ।
मास्टर अपनी विद्यार्थी के उत्तर से संतुष्ट होता बल्कि उससे अगला प्रश्न कर देता और कहता,यानि तुम्हारा शरीर जापान की धरती पर उपजे अन्न से फला-फूला है। और यदि आप कहेंगे की मेरा शरीर मेरे माता पिता की देखभाल के कारण ही हृष्ट-पुष्ट है तो वह भी तो आपको सब कुछ जापान की भूमि से ही उपलब्ध करवा रहे हैं। क्योंकि आपके माता पिता भी अपने देश की बदौलत ही जीवित हैं। मैं सही बोल रहा हूँ ?
विद्यार्थी-जी हाँ मास्टर जी!आपका कथन पूर्णतः सही है।
मास्टर-अगर जापान आपको खाने के लिए अन्न देता, तो आप आज इस प्रकार फले-फूले होते।
विद्यार्थी-मास्टर जी! हो सकता है  मैं जीवित ही होता।
 
मास्टर पुनः अपने विद्यार्थी से सवाल करता तो क्या फिर आपके देश जापान को आप यह अधिकार देते हैं कि आवश्यकता पड़ने पर तुमसे तुम्हारा शरीर मांग ले? फिर तुम कोई आना कानी तो नहीं करोगे?
विद्यार्थी-मास्टर जी!मैं कतई ऐसा नहीं कर सकता,क्योकि मेरे शरीर पर मुझसे ज्यादा मेरे देश जापान का अधिकार है। अपने देश हिट के लिए मैं किसी भी प्रकार की कोई भी क़ुरबानी देने से कभी पीछे नहीं हटूँगा ....
स्वामी जी इतना कह कर थोड़ा थम जाते हैं और कहते हैं कि इस प्रकार प्रत्येक जापान वासी की रगों में अपने देश  के लिए मर मिटने का जुनून बचपन में ही भर दिया जाता है। इसी कारण जापान के लोगों में अपने देश पर मर मिटने का अपार जज़्बा होता है।  
अगर ऐसा ही जज़्बा हमारे देश के लोगों के अंदर आ जाये तो इस देश को कोई भी जंज़ीर गुलामी के अभिशाप में नहीं जकड़ सकती। 

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