Tuesday, June 25, 2019

तेरे आग़ोश में


अंधेरों  में रह कर जीना सीख लिया मैंने,
तेरे आग़ोश में सितारों की तमन्ना किये जा रहा हूँ।
गर्दिशे वक़्त होने दूंगा किसी को जाहिर अपना,
मैं अपने गम को पिए जा रहा हूँ।

जिन आँखों में सजाए थे सपने प्यार के,
आज उन्हीं आँखों से नीर बहाए जा रहा हूँ।
जब कि मालूम है तुम नहीं आओगे यहाँ।
फिर भी जाने क्यों तेरा इंतज़ार किए जा रहा हूँ।

जिन लम्हों ने गए थे प्यार के नगमें तेरे लिए,
आज उन्हीं लम्हों में ज़हर पी रहा हूँ मैं
बदनाम होने दूंगा तुम्हें दोस्त,
तोहफाए मौत खुदा से मांगे जा रहा हूँ मैं।

आह लग जाए कहीं मेरे टूटे दिल की तुझे,
मैं कब्र भी तेरे शहर से दूर बना रहा हूँ। 
(गोबिंद यादव)

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