Saturday, June 1, 2019

सत्संग और विवेक के चक्षु


गरुड़ अनंत गति से चलने वाला वाहन है या यूँ कह सकते हैं कि गरुड़ एक पल में सकल ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने की क्षमता रखता है। इसलिए इस पर सिर्फ अखिल ब्रह्माण्ड नायक भगवान् श्री हरि ही सवार हो सकते हैं।एक बार गरुड़ के मन में मृत्यु से सम्बंधित प्रश्न पैदा हुए तो वह इसके समाधान के लिए प्रभु विष्णु जी से आग्रह करने लगे। भगवान् श्री हरि पक्षी राज की जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिए तत्क्षण ही तैयार हो गए क्योंकि प्रभु नहीं चाहते थे कि उनके प्रिय वाहन गरुड़ की गति को उनके मन में पैदा हुई संशय की कोई पतली सी झिल्ली भी बाधित न करे। प्रभु की आज्ञा मिलने पर गरुड़ ने अपनी जिज्ञासा उनके समक्ष रखते हुए कहा-प्रभु! क्या मृत्यु के समय सबको ही अनंत कष्ट का सामना करना पड़ता है? क्या सबको ही असंख्य बिच्छुओं के काटने जितनी पीड़ा सहन करनी पड़ती है? श्री हरी गरुड़ जी का प्रश्न सुनकर थोड़े गंभीर हुए और फिर कहने लगे, ' गरुड़ जी! जो लोग अपने जीवन में सदैव सत्य पथ का अनुगमन करते हैं। झूठ, फरेब, छल -कपट, ईर्ष्या-द्वेष  केवशीभूत होकर किसी का अहित नहीं करते, ऐसे लोग निश्चय ही सुखपूर्वक शरीर का त्याग करते हैं। लेकिन जो लोग सदा छल-कपट, झूठ, किसी का अहित, विश्वासघाती, निंदक और धर्म के विरुद्ध आचरण करते हैं। वह निश्चित ही दुःखद मृत्यु को प्राप्त होते हैं।'

लेकिन मनुष्य के अंदर ऐसे भाव सिर्फ सत्संग और विवेक के द्वारा ही पैदा हो सकते हैं। क्योंकि यही मनुष्य के सच्चे नेत्र हैं। चर्म चक्षु धोखा खा सकते हैं लेकिन विवेक और सत्संग के द्वारा उन्मीलित नेत्र जाग्रित नेत्र हैं। क्योंकि सत्संग के आभाव में मनुष्य अनंत काल तक सदा अन्धकार में ही भटकता रहता है।' इसलिए सदैव सत्पुरुषों के सत्संग के द्वारा अपने विवेक रूपी चक्षु को जागृत रखें और अपना इहलोक और परलोक दोनों को ही सुंदर एवं सुखमय बनाएँ।


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