Tuesday, June 4, 2019

O God! Why Only Me.


जीवन सुख दुःख का एक mixture है। अपने-अपने समय के हिसाब से या यों कह सकते हैं कि किसी व्यक्ति के संस्कारों के हिसाब से यह उसके जीवन में दस्तक देते रहते हैं। लेकिन विडंबना तो यह है कि एक व्यक्ति सारा दिन परमात्मा से सुख की चाहत करता है। उसकी धुरी सिर्फ जीवन को सुखमय बनाने के इर्द-गिर्द ही घूमती है। लेकिन फिर भी दुःख उसके जीवन में अनचाहे मेहमान की तरह आ ही धमकता है। जिसे न चाहते हुए भी उसे अपने जीवन में स्थान देना पड़ता है। लेकिन जो मनुष्य सुख को अपने शुभ कर्मों  का फल मानता है वही अपने जीवन में आए दुःख के लिए सिर्फ परमात्मा को ही दोषी मानता है और हमेशा यही कहता है,'भगवान्! क्या आपने  दुख देने के लिए सिर्फ मुझे ही चुनना था। सारी दुनिया छोड़कर क्या आपको मैं ही दिखाई दे रहा था, जिसकी झोली में अपने इतने दुःख-कष्ट भर दिए। 
यह कहना तनिक भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इंसान दुःख में पूरा दिन उस प्रभु परमेश्वर को उलाहने देते हुए बतीत करता है। लेकिन सुख के समय उसने कभी किसी दुःखी को देख कर यह नहीं कहा कि प्रभु मेरे हिस्से का थोड़ा सुख उसकी झोली में भी डाल देता।' वह बेचारा कितने कष्ट में है। हालांकि माता कुंती ने प्रभु श्री कृष्ण से अपने लिए सिर्फ दुखों की ही कामना की थी,क्योंकि वह समझ चुकी थीं कि दुःख के समय प्रभु श्री कृष्ण सदैव उनके साथ रहे। और आज जब पाण्डवों को अपना खोया राजपाठ मिल रहा है तो प्रभु श्री कृष्ण उन्हें छोड़ कर वापिस द्वारिका जा रहे थे। तात्पर्य यह है कि ईश्वर दुःख के समय हमारे ज्यादा करीब होते हैं। यह अलग बात है कि हम उन्हें महसूस कर पाते हैं या नहीं। हमारे महसूस न करने के कारण ही हम परमात्मा को प्रश्न कर देते हैं-O God! Why Only Me. 

आएँ अपने इस प्रश्न का हल पाने की लिए विम्बलडन विजेता मशहूर प्लेयर आर्थर के जीवन से कुछ प्रेरणा प्राप्त करते हैं। सन् 1983 में आर्थर के दिल की सर्जरी हुई। इस सर्जरी के दौरान उन्हें संक्रमित खून लगने की वजह से एड्स हो गया। जब यह खबर उनके प्रशंसकों तक पहुंची, तो वह सब बहुत ही दुःखी हो गए। किसी ने भगवान् के आगे प्रार्थना की, किसी ने अफ़सोस में आँसू बहाए और किसी ने उनके ठीक होने के लिए उपवास रखे। उनके कई प्रशंसकों को बहुत गुस्सा भी आ गया। उनके एक प्रशंसक ने आर्थर को एक पत्र लिखा और भगवान् के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करते हुए आर्थर से प्रश्न किया-भगवान् ने सिर्फ आपके साथ ही क्यों ऐसा किया?क्यों भगवान् ने आखिर क्यों आपको ही इस भयानक बीमारी के लिए चुना? परमात्मा इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?'
आपने उस प्रशंसक ने के इस सवाल का जवाब देते हुए आर्थर ने कहा,
विश्व में लगभग 2 करोड़ लोग टैनिस खेलना शुरू करते हैं।
इनमें से सिर्फ 50 लाख के लगभग टैनिस खेलना सीख पाते हैं।
इनमें से 5 लाख के करीब professional प्लेयर बन पाते हैं।
आगे इनमें भी सिर्फ 50 हज़ार ऐसे होते हैं जो देश के लिए खेलने का अवसर प्राप्त कर पाते हैं।
 सिर्फ 5 हज़ार Grand Slam तक आ पाते हैं।
इसके बाद सिर्फ 50 रह जाते हैं जो Wimbledon तक आते हैं।
 4 सेमी-फाइनल तक!
2 फाइनल तक और जीतता सिर्फ एक ही है।
और वह मैं था।
जब मैंने Wimbledon जीत कर ट्रॉफी अपने हाथ में पकड़ी थी, तब मेरे मन में यह सवाल कहीं भी नहीं उठा था-'O God Why Me? तो आज इस बीमारी में उस ईश्वर से यह प्रश्न क्यों? क्यों कहूँ कि ईश्वर मैं ही क्यों?
इसलिए आर्थर का जीवन हमें प्रेरणा देता है कि हमे जीवन के प्रति समयक दृष्टिकोण रखना चाहिए। तभी हम वास्तविक सुख आनंद को प्राप्त कर सकते हैं। नहीं तो कई लोग सुख में भी सिर्फ दुःख की ही परछाई देखने का हुनर रखते हैं।

No comments:

Post a Comment